कश्ती उबारने को आया नया मांझी – Kharge takes the reins


मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ कई विरोधाभास जुड़े हैं. अपने जीवनकाल में उन्होंने कुल 13 चुनाव लड़े हैं जिनमें कांग्रेस अध्यक्ष के लिए हाल ही में संपन्न चुनाव भी शामिल है, जिनमें से 12 में जीत हासिल की है. फिर भी, उनकी छवि एक लोकप्रिय जननेता की नहीं है. अपनी ”विशाल कद-काठी’’—जैसा कि उनके एक करीबी रिश्तेदार का कहना है—

के कारण उन्हें एक बहुत गंभीर व्यक्ति के रूप में ही देखा गया है लेकिन वास्तव में वे बड़े मजाकिया स्वभाव के हैं. उनके अधिकांश राजनैतिक सहयोगियों ने उन्हें विनम्र और शांत स्वभाव वाला व्यक्ति ही पाया है, लेकिन घर पर वे एक सख्त अनुशासन पसंद व्यक्ति हैं.

उनके बेटे और कर्नाटक के विधायक प्रियांक खड़गे, कहते हैं, ”वे जब घर पर होते हैं, यहां तक कि उनके पोते-पोतियां भी बहुत चौकन्ने और सजग रहते हैं. उनकी जागरूकता के स्तर की जांच के लिए वे उनसे ग्लोबल वार्मिंग से लेकर जनता के किसी स्थानीय मुद्दे तक, किसी भी विषय पर प्रश्न पूछ लेते हैं. भोजन, पानी या बिजली बर्बाद न हो, इसका वे खास ध्यान रखते हैं.’’ 

एक पूर्व खिलाड़ी खड़गे, जिन्होंने अपनी युवावस्था में कई खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, अपने कामकाज और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए काफी अनुशासित हैं. उन्हें खाने के शौकीन व्यक्ति के रूप में जाना जाता है, जिसे अपने मांसाहारी भोजन और ज्वार की रोटी से बहुत लगाव है.

लेकिन अक्सर आधे दिन से अधिक समय तक चलने वाली पार्टी बैठकों और कार्यक्रमों में वे बिना कोई ब्रेक लिए बैठते हैं. अनियमित दिनचर्या के बावजूद, खड़गे 80 साल की उम्र में भी चुस्त-दुरुस्त हैं और उन्हें बुढ़ापे वाली कोई बीमारी नहीं है. उन्होंने अपना 80वां जन्मदिन प्रवर्तन निदेशालय की तरफ से निवर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से पूछताछ के विरोध में प्रदर्शन करते हुए दिल्ली की सड़कों पर बिताया. 

2014 के बाद से 50 विधानसभा चुनावों में 42 पराजय और दो लोकसभा चुनावों में अपमानजनक हार के साथ कांग्रेस अपने 136 साल के इतिहास में सबसे खराब राजनैतिक संकट से गुजर रही है और पार्टी को इससे बाहर निकालने के लिए उसने शशि थरूर को पछाड़कर अध्यक्ष बने इस बुजुर्ग नेता पर भरोसा किया है. पार्टी भारत के 30 राज्यों में से केवल दो में सत्ता में है और संसद में इसकी ताकत दोहरे अंक के मध्य में सिमट चुकी है—लोकसभा में 53 सदस्य और राज्यसभा में केवल 31.

यह आसान सफर नहीं होने वाला है. खड़गे भले ही कप्तान चुने गए हों, लेकिन उन्हें इस धारणा से लगातार जूझना होगा कि वे शायद रिमोट से नियंत्रित हो रहे अध्यक्ष हैं. कांग्रेस के इतिहास में पहली बार है कि गांधी परिवार के तीन लोग—सोनिया, राहुल और प्रियंका—राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन पार्टी की कमान एक गैर-गांधी के हाथ में है.

उनके विरोधियों का दावा है कि खड़गे केवल रबड़ स्टांप होंगे, बाकी सब कुछ वैसा ही चलता रहेगा जैसा कि चलता आया है, बस चुनावों में शर्मनाक प्रदर्शन की जवाबदेही अब गांधी परिवार पर नहीं आएगी. कांग्रेस के एक युवा लोकसभा सांसद कहते हैं, ”अगर गांधी परिवार दायित्व बन गया है, तो खड़गे इसका उत्तर नहीं हो सकते. वे परिवार के दरबारियों में से एक हैं और उनके हित में काम करेंगे न कि पार्टी के हित में.’’

कई अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यह ”गांधी परिवार के हितों’’ के प्रति उनकी बहुत ही अडिग वफादारी ही है जिसने उन्हें अध्यक्ष पद के लिए गांधी परिवार का ”अनौपचारिक रूप से आधिकारिक’’ उम्मीदवार बनाया. कांग्रेस के साथ अपने 53 साल के जुड़ाव में, खड़गे ने कभी भी कोई विद्रोह नहीं किया, सिवाय एक साल से भी कम समय की एक बहुत छोटी अवधि को छोड़कर, जब उन्होंने 1979 में अपने गुरु और कर्नाटक के पूर्व सीएम देवराज अर्स के साथ कांग्रेस छोड़ दी थी.

मुख्यमंत्री बनने का मौका न मिलने पर भी उन्होंने नाराजगी नहीं जाहिर की और ऐसा तीन बार हुआ. 1999 में, उन्हें मात देते हुए एस.एम. कृष्णा मुख्यमंत्री बन गए. 2004 में, कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए उनके करीबी दोस्त धरम सिंह आम सहमति के उम्मीदवार बने. 2013 में सिद्धारामैया ने बाजी मार ली.

लेकिन ऐसे समय में जब गांधी परिवार की पकड़ खुद ही घटती जा रही हो, क्या खड़गे अंतत: ”कमजोर अध्यक्ष’’ बनकर रह जाएंगे? पिछले आठ वर्षों में, वे असम, पंजाब और राजस्थान में सत्ता के आंतरिक विवादों को सुलझाने के लिए गांधी परिवार के चुने हुए दूत थे, लेकिन वे कहीं भी अनुकूल परिणाम देने में सक्षम नहीं हो सके. जुलाई 2014 में, उन्हें एक पर्यवेक्षक के रूप में असम भेजा गया था, जब तत्कालीन सीएम तरुण गोगोई अपने भरोसेमंद सिपहसालार हिमंत बिस्वा सरमा की बगावत से जूझ रहे थे.

राज्य के 78 पार्टी विधायकों में से 54 ने खड़गे को एक हस्ताक्षरित दस्तावेज सौंपते हुए कहा था कि वे नहीं चाहते कि गोगोई कुर्सी पर बने रहें. कोई नहीं जानता कि खड़गे ने आलाकमान को क्या रिपोर्ट दी, लेकिन गोगोई ने ही कुर्सी संभाली. एक साल बाद, सरमा भाजपा में शामिल हो गए और तब से न केवल असम से बल्कि अन्य पूर्वोत्तर राज्यों से भी वे कांग्रेस को उखाड़ फेंकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. 

जून 2021 में, खड़गे ने पंजाब कांग्रेस में तत्कालीन सीएम अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच की कलह खत्म करने के लिए तीन सदस्यीय पैनल का नेतृत्व किया. खड़गे निष्प्रभावी रहे और अंतत: अमरिंदर को मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए कहा गया, जबकि सिद्धू को पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया. इसका परिणाम: इस साल की शुरुआत में विधानसभा चुनावों में पंजाब में पार्टी का पतन हो गया, अमरिंदर भाजपा में शामिल हो गए और तीन दशक पुराने मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद सिद्धू जेल में हैं.

सबसे ताजा उपद्रव पिछले महीने हुआ जब खड़गे, राजस्थान के अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रभारी अजय माकन के साथ, पार्टी के विधायकों की ओर से एक-लाइन का प्रस्ताव पारित कराने के लिए जयपुर पहुंचे. यह प्रस्ताव कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को राज्य के अगले मुख्यमंत्री के चयन के लिए अधिकृत करने का था. ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए अशोक गहलोत गांधी परिवार की पहली पसंद थे.

मई में ‘एक व्यक्ति, एक पद’  की नीति के पार्टी के उदयपुर प्रस्ताव पर अमल करने के लिए गहलोत को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ता. खड़गे और माकन गहलोत के आवास पर इंतजार करते रहे, जहां प्रस्ताव पारित करने के लिए कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई गई थी, लेकिन गहलोत के वफादार विधायकों ने खुले तौर पर आलाकमान के फरमान की अवहेलना की और वे बैठक में नहीं आए. गहलोत ने बाद में सोनिया से शर्मिंदगी के लिए माफी मांगी और अध्यक्ष पद की दौड़ से हट गए. 

हालांकि, गहलोत ने अपनी कुर्सी (अब तक) बचा रखी है, खड़गे को अब सीएम और राजस्थान के पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के बीच सुलह करानी होगी. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि गहलोत की अवज्ञा गांधी परिवार के प्रभुत्व को एक सीधी चुनौती थी. अब खड़गे अध्यक्ष हैं और बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि परिवार उस अपमान का जवाब कैसे देता है—क्या वह पार्टी पर अपने घटते दबदबे की सच्चाई को स्वीकारते हुए शांत रहता है या फिर गहलोत को उनकी हैसियत दिखाई जाती है. 

यह एकमात्र झगड़ा नहीं है जिसे नए कांग्रेस अध्यक्ष को सुलझाना होगा. अगले साल जिन दो अन्य राज्यों में चुनाव हैं, तनाव वहां भी बढ़ रहा है. छत्तीसगढ़ में सीएम भूपेश बघेल को स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंह देव से चुनौती मिल रही है. कर्नाटक में अगर पार्टी चुनाव जीतती है तो सीएम पद पर प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारामैया दोनों की नजर है.

इस बीच, पार्टी के मामलों से अलग एक और बड़ी लड़ाई खड़गे की प्रतीक्षा कर रही है. भाजपा के उदय के साथ, चुनावों में कांग्रेस के पतन में तेजी आई है, लेकिन सच्चाई यह है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण कई राज्यों में तो पार्टी का पतन लगभग चार दशक (देखें: पार्टी को जिंदा करने की जुगत) पहले ही शुरू हो गया था.

इन छह राज्यों में 270 लोकसभा सीटें हैं, जो लोकसभा की ताकत की लगभग आधी हैं, और कांग्रेस 2019 में उनमें से केवल 14 पर जीत हासिल कर सकी. यह 2014 में जीती 10 सीटों में मामूली सुधार था. वह पिछले चार दशकों में से दो में केंद्र में सत्ता में थी, फिर भी पार्टी ने इन राज्यों में गिरावट को रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए.

इसके दो शीर्ष नेताओं—सोनिया और राहुल—ने लोकसभा में यूपी का प्रतिनिधित्व किया और परिवार की तीसरी सदस्य प्रियंका, 2019 के लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान राज्य कांग्रेस इकाई की प्रभारी थीं. फिर भी कांग्रेस राजनैतिक रूप से भारत के सबसे महत्वपूर्ण राज्य में लोकसभा में मात्र एक सीट और विधानसभा में दो सीटों पर सिमटकर अप्रासंगिक हो चुकी है.

अगर पार्टी के प्रदर्शन का विश्लेषण उत्तर के अन्य छह राज्यों में किया जाए, जहां उसका सीधा मुकाबला भाजपा से है, तो चुनौती और भी कठिन लगती है. इन राज्यों—हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, एमपी, गुजरात और छत्तीसगढ़—में 100 लोकसभा सीटें हैं. 2018 में, कांग्रेस ने उनमें से तीन—राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव जीते. फिर भी, पिछले दो आम चुनावों में, पार्टी ने 100 में से केवल तीन सीटें जीतीं. यह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के उत्तराधिकारी राहुल गांधी के बीच मुकाबले में राहुल के लिए इन राज्यों में कोई संभावना नहीं है.

नए कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में, क्या एक दक्षिण भारतीय नेता इन राज्यों में पार्टी की किस्मत बदलने में सक्षम होगा? भाषा बाधा नहीं होनी चाहिए क्योंकि खड़गे पांच भाषाएं—अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, कन्नड़ और मराठी धाराप्रवाह बोल लेते हैं. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों को उनकी दलित पहचान से बड़ी उम्मीदें हैं. 1970 में जगजीवन राम के बाद पांच दशकों में वे पार्टी के पहले दलित अध्यक्ष हैं जो अनुसूचित जाति के वोट को आकर्षित करने में काम आएगा.

लेकिन प्रतीक की राजनीति हमेशा अपेक्षित लाभ नहीं देती जैसा कि पंजाब में हुआ जहां दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी, अमरिंदर की जगह सीएम बने थे. दोनों नेता अपनी-अपनी सीटों पर हार गए. एक उत्तर भारतीय राज्य के एआइसीसी प्रभारी कहते हैं, ”भाजपा के आक्रामक हिंदुत्वादी राष्ट्रवाद का मुकाबला करने के लिए पार्टी को इन राज्यों में एक प्रासंगिक और आकर्षक आख्यान की जरूरत है. प्रतीकवाद को फिर से शुरू करने से कोई खास लाभ नहीं होने जा रहा.’’ 

केरल और कर्नाटक को छोड़कर, दक्षिण में भी कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट बना हुआ है. 2014 में आंध्र प्रदेश का विभाजन हुआ. इसे कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की ओर से नवनिर्मित तेलंगाना को उपहार के रूप में देखा गया था लेकिन दोनों राज्यों में पार्टी का सफाया हो गया है. नए आंध्र प्रदेश से न तो विधानसभा और न ही लोकसभा में कांग्रेस का कोई प्रतिनिधि है. इसकी तुलना 2009 से करें जब अविभाजित आंध्र ने कांग्रेस के 33 सांसदों को लोकसभा में भेजा था, जो सभी राज्यों में सर्वाधिक था.

आम आदमी पार्टी जैसी नई ताकतों के उभरने से कांग्रेस को उन राज्यों में पांव जमाना मुश्किल हो रहा है जो उसकी पूंजी रहे हैं. अगर आप ने कांग्रेस से दिल्ली और पंजाब छीन लिए हैं, तो अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली पार्टी गुजरात और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के वोटों में और विभाजन कराएगी. ये दो चुनावी राज्य खड़गे के लिए पहला लिटमस टेस्ट साबित होंगे.

फिर 2024 का आम चुनाव है, जिसमें दो साल से भी कम समय बचा है. अधिकांश कांग्रेस नेता इससे सहमत हैं कि पार्टी अपने दम पर भाजपा का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है. एक व्यावहारिक रणनीति यह होगी कि गैर-भाजपा वोटों के बंटवारे से बचने के लिए अन्य विपक्षी दलों के साथ चतुराईपूर्ण चुनाव-पूर्व सीट बंटवारे के साथ, एक कारगर गठबंधन तैयार किया जाए.

सीडब्ल्यूसी के एक सदस्य का कहना है, ”खड़गे को टीएमसी, सपा, राजद जैसे दलों के शीर्ष नेताओं के साथ समन्वय की आवश्यकता होगी, जो अपने-अपने राज्यों में मजबूत हैं. बड़े भाई की भूमिका निभाने के बजाए, उन्हें यूपीए को पुनर्जीवित करने के लिए मध्यस्थ बनते हुए उन सभी को एक मंच पर लाने के प्रयास करने होंगे.’’ आलोचकों का मानना है कि वे केवल परिवार के दूत बने रहेंगे, जिससे नौकरशाही की एक और परत बन जाएगी.

तमाम शंका-संदेहों के बावजूद, खड़गे ने ऐसे समय में कार्यभार संभाला है जब राहुल की भारत जोड़ो यात्रा ने पार्टी को लेकर सकारात्मक चर्चा का माहौल बनाया है. इस आयोजन का लक्ष्य 2024 के लिए जमीन तैयार करना है और इस यात्रा के प्रभाव का आकलन चुनाव परिणामों के आधार पर न हो, इसको लेकर कांग्रेस बहुत सतर्क है (यात्रा हिमाचल और गुजरात से नहीं गुजरेगी). 12 राज्यों में 3,570 किमी की दूरी तय करने वाली 157-दिवसीय यात्रा के जरिए कांग्रेस एक द्विध्रुवीय कथ्य गढ़ना चाहती है—भाजपा की विभाजनकारी राजनीति बनाम कांग्रेस की समावेशी राजनीति. 

यह मिशन अगर सफल भी हो जाता है तो भी खड़गे के लिए सामने बहुत बड़ा टास्क होगा—यात्रा से बने माहौल को वोटों में तब्दील करना. एक मायने में, वे ऐसा करने के लिए सही व्यक्ति हो सकते हैं. सात साल की उम्र में, खड़गे ने अपनी मां को सांप्रदायिक हिंसा में खो दिया था, जिससे परिवार को पुराने हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र के वारावट्टी से भागकर पड़ोसी गुलबर्गा (अब कलबुर्गी) में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसलिए वे हमेशा से सांप्रदायिक राजनीति के प्रबल विरोधी रहे हैं.

लेकिन इस समावेशी कथा को मतदाताओं तक ले जाने के लिए पार्टी के निष्क्रिय पड़े देशव्यापी संगठन में जान फूंकनी होगी. घर में, खड़गे जो अपनी बात को लेकर आग्रही बने रहते हैं, अपने पोते-पोतियों के गंदे जूतों को पॉलिश करने से भी गुरेज नहीं करते हैं. अब उन्हें कांग्रेस की गंदगी साफ करने के लिए हाथ गंदे करने होंगे.

उनका पहला कदम उदयपुर प्रस्ताव पर अमल हो सकता है. पार्टी में युवा जोश को आगे लाने और इसे नए अवतार में पेश करने के लिए खड़गे को पार्टी के 50 प्रतिशत पदों पर 50 साल से कम उम्र के लोगों को बिठाना होगा. वे एक नई कांग्रेस कार्यसमिति के गठन के साथ इसकी शुरुआत कर सकते हैं. 



Source link

Spread the love