भव्य भंगिमाएं – Grand Gestures


पिछले हफ्ते पूरे भारत के अलावा 10 अन्य देशों के लगभग 1,500 नर्तक राष्ट्रीय जनजातीय नृत्य महोत्सव के लिए रायपुर पहुंचे थे. इस भव्य समारोह में विविध लोक कला प्रदर्शनों, संगीत और विभिन्न प्रकार के भोजन स्टॉल थे. लेकिन इससे परे यह उत्सव काफी महत्वपूर्ण था—सभी जानते थे कि भूपेश बघेल सरकार इसके माध्यम से छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को खुश करने का प्रयास कर रही है. 

1 से 3 नवंबर तक आयोजित होने वाले इस नृत्य उत्सव का तीसरा संस्करण ऐसे समय में हुआ है जब विधानसभा चुनाव होने में एक साल से अधिक का समय बचा है और छत्तीसगढ़ के आदिवासी समूहों तथा अन्य समुदायों के बीच असहमति की रेखाएं गहरा रही हैं. आदिवासी इस राज्य की आबादी का 31 प्रतिशत हिस्सा हैं. छत्तीसगढ़ 9 अगस्त को पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम (पेसा), 1996 के तहत नियमों की अधिसूचना जारी करने वाला देश का सातवां राज्य बना था. आदिवासियों को उम्मीद थी कि इससे उन्हें ग्रामसभाओं के माध्यम से काफी अधिकार मिलेंगे, लेकिन उनका कहना है कि नए नियमों में जिलाधिकारियों को अधिक अधिकार-संपन्न बनाया गया है. बहरहाल, अन्य गैर-आदिवासी समूहों, मुख्यत: पिछड़ा वर्ग, भी इन नियमों के खिलाफ है.

इसके अलावा, सितंबर में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आरक्षण नियमावली, 1994 में 2012 में किए गए संशोधन को रद्द करते हुए फैसला सुनाया है कि शैक्षणिक संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण देने में 50 प्रतिशत की उच्चतम सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता. रद्द किए गए संशोधन के माध्यम से राज्य में आदिवासियों के लिए कोटा 20 से बढ़ाकर 32 फीसद किया गया था. संशोधन के बाद अनुसूचित जाति की आरक्षण में हिस्सेदारी 16 फीसद से घटकर 12 फीसद रह गई थी और पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी 14 फीसद पर अपरिवर्तित रही थी जिससे कुल आरक्षण 58 फीसद तक पहुंच गया था. इस फैसले ने आदिवासी समूहों को नाराज कर दिया है. इन समूहों का आरोप है कि बघेल सरकार ने पहले उच्च न्यायालय में प्रभावी  ढंग से उनका पक्ष नहीं रखा, और अब फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने से पीछे हट रही है. राज्य के 42 आदिवासी समूहों के एक छात्र संगठन ‘सर्व आदिवासी समाज’ ने 32 फीसद आरक्षण की बहाली की मांग पर दबाव बनाने के लिए नृत्य महोत्सव के बहिष्कार का आह्वान किया था. समाज ने यह भी कहा है कि वह 15 नवंबर को आर्थिक नाकाबंदी करेगा.

विपक्षी भाजपा विरोध प्रदर्शन आयोजित करने से लेकर कांग्रेस पर कटाक्ष करने तक इस स्थिति का लाभ लेती दिख रही है. ऊपर से, राज्यपाल अनुसुइया उइके ने 3 नवंबर को मुख्यमंत्री बघेल को पत्र लिखकर अनुसूचित जनजातियों का कोटा बहाल करने के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी मांगी है. कांग्रेस हालांकि अदालत में कानून के न टिक पाने के लिए पूर्ववर्ती रमन सिंह सरकार को आरक्षण नियमों में कानूनी दृष्टि से मजबूत संशोधन न करने का दोषी ठहराती है, फिर भी इस मामले में अब तक वह बचाव की मुद्रा में है. 

इन स्थितियों के बीच बघेल को शायद नृत्य उत्सव में अपनी स्थिति ठीक करने का मौका दिखा और उन्होंने आदिवासियों को भूमि के पट्टे देने के अलावा 2005 में भाजपा सरकार द्वारा टाटा स्टील की एक परियोजना के लिए लोहंडीगुडा में अधिग्रहीत 1,764 हेक्टेयर भूमि भी मूल मालिकों को लौटा दी. टाटा स्टील की परियोजना यहां स्थापित नहीं हो सकी थी. उत्सव में अपने संबोधन के दौरान बघेल ने कहा कि ”विकास की गलत अवधारणा प्रकृति के लिए खतरा बन गई है. इसने जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकारों को भी खतरे में डाला है.” उन्होंने हाल में यह भी कहा कि उनकी सरकार आदिवासियों की आबादी के हिसाब से उनका आरक्षण बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी.

एक और अहम कदम उठाते हुए राज्य सरकार ने 31 अक्तूबर को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को पत्र लिखकर राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को हसदेव अरंड वन के परसा कोयला ब्लॉक में 841.54 हेक्टेयर भूमि के गैर-वानिकी उपयोग के लिए दी गई मंजूरी को रद्द करने की मांग भी की है. इस पत्र में कहा गया है कि उक्त क्षेत्र के आसपास जारी विरोध कानून और व्यवस्था का मुद्दा बन सकता है. 

क्यों महत्वपूर्ण हैं आदिवासी वोट

राज्य विधानसभा की 90 सीटों में से 29 अनुसूचित जनजातियों के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं. अभी कांग्रेस के पास उत्तरी छत्तीसगढ़ में सभी 14 और दक्षिण छत्तीसगढ़ में 12 सीटें हैं. इन इलाकों में आदिवासी वोट महत्वपूर्ण हैं. पार्टी के पास अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 27 सीटें हैं, जबकि 2013 में उसने 18 सीटें जीती थीं.

हिंदुत्व के मुद्दे पर सवार भाजपा की नजर उत्तरी छत्तीसगढ़ में वापसी पर है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत आगामी 14 नवंबर को दिवंगत भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव की प्रतिमा का अनावरण करने के लिए जशपुर में होंगे. इस कार्यक्रम में धर्मांतरण का मुद्दा हावी रहने की संभावना है क्योंकि राज्य में जूदेव की व्यापक छवि उनके ‘घर वापसी’ अभियानों से जुड़ी थी. संरचनात्मक रूप से भी, भाजपा ने अगस्त में अपनी राज्य इकाई में बड़े बदलाव करते हुए अपनी चुनावी संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए कई नए चेहरों को शामिल किया है.

इतने बड़े-बड़े दांवों के बीच यह नृत्य उत्सव शायद आदिवासी वोटों के इर्द-गिर्द हो रही राजनीति की एक झलक भर था. दोनों पार्टियों की ओर से बेहतर चालें चले जाने के साथ यह राजनीति और अधिक तेज हो सकती है



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