रामधारी सिंह दिनकर की 123वीं जयंती पर उनके जीवन और कविताओं की पड़ताल – Ramdhari Singh Dinkar 123rd Birth Anniversary special, Dinkar best poem


आज रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की 123वीं जयंती हैं दिनकर राष्ट्र के, अध्यात्म के, जन के, पुराण के कवि हैं. भले ही वे अभी हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी कवितायें आज भी जीवंत और प्रासंगिक हैं. उनकी बेबाकी का आलम यह था कि संसद में पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे कद्दावर नेता की आलोचना सदन को आज भी याद हैं खास बात यह कि दिनकर आज भी युवाओं के पसंदीदा कवि हैं, और उनकी कवितायें अकसर युवाओं के मुख से सुनने को मिल जाती है.
भारतीय साहित्य को सूर्य सदृश अपनी मेधा से रौशन करने वाले कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 23 सितम्बर, 1908 में बेगूसराय के सिमरिया गांव में हुआ था. आजादी के पूर्व उन्हें विद्रोही कवि के रूप में जाना जाता था. आजाद भारत में वह राष्ट्रकवि के रूप में लोकप्रिय हुए. आइये ‘दिनकर’ की कुछ चर्चित व वर्तमान समय में प्रासंगिक कविता अंशों पर नजर डालते हैं-

हमारे कृषक

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है
छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है
मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है
वसन कहां? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है

बैलों के ये बंधू वर्ष भर क्या जाने कैसे जीते हैं
बंधी जीभ, आंखें विषम गम खा शायद आंसू पीते हैं
पर शिशु का क्या, सीख न पाया अभी जो आंसू पीना
चूस-चूस सूखा स्तन मां का, सो जाता रो-विलप नगीना

विवश देखती मां आंचल से नन्ही तड़प उड़ जाती
अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती
कब्र-कब्र में अबोध बालकों की भूखी हड्डी रोती है
दूध-दूध की कदम-कदम पर सारी रात होती है
दूध-दूध औ वत्स मंदिरों में बहरे पाषान यहां है
दूध-दूध तारे बोलो इन बच्चों के भगवान कहां हैं

दूध-दूध गंगा तू ही अपनी पानी को दूध बना दे
दूध-दूध उफ कोई है तो इन भूखे मुर्दों को जरा मना दे
दूध-दूध दुनिया सोती है लाऊं दूध कहां किस घर से
दूध-दूध हे देव गगन के कुछ बूंदें टपका अम्बर से

हटो व्योम के मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं
दूध-दूध हे वत्स! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं.

यह कविता हमारे किसानों की स्थिति को दर्शाती है. वर्तमान में भी किसान उसी दशा और दिशा में खड़ा है. इस कविता के द्वारा दिनकर ने किसानों के घर के हालातों का चित्रण पाठकों के सामने खींचा है. वर्तमान में जब छोटे व मंझले किसान सरकार की नई कृषि नीति से सहमे हुए हैं और आंदोलनरत हैं, तब तो दिनकर और भी याद आते हैं. उनकी एक और कविता है-

कलम या कि तलवार

दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार
मन में ऊंचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार

अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊंचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान

कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली

पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे,
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे

एक भेद है और वहां निर्भय होते नर -नारी,
कलम उगलती आग, जहां अक्षर बनते चिंगारी

जहां मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले,
बादल में बिजली होती, होते दिमाग में गोले

जहां पालते लोग लहू में हालाहल की धार,
क्या चिंता यदि वहां हाथ में नहीं हुई तलवार…

इस कविता में दिनकर जी ने कलम की महत्ता को बताया है. कलम व विचारों का जो परस्पर संबंध है, जो न्यायप्रियता या निष्पक्षता अपने समय और समाज को लेकर कलम में होनी चाहिए, दिनकर जी उसी की बानगी खींचते हैं. वह बताते हैं कि कैसे विचार कलम के द्वारा अक्षर; शब्द में, कविता में, गद्य और चिंतन में परिवर्तित होते हैं. ऐसी ही उनकी एक कविता है-

रोटी और स्वाधीनता

आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहां जुगाएगा?
मरभुखे  इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा?
आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,
पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं.

हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले,
पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले.
इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है?
है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है?

झेलेगा यह बलिदान? भूख की घनी चोट सह पाएगा?
आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा?
है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी,
बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी.

रोटी और स्वाधीनता कविता भुखमरी की ओर इशारा करती है और यह बताती है कि भूखे पेट आजादी की लड़ाई नहीं लड़ा जा सकती. महाराणा प्रताप का उदाहरण देते हुए वह बताते हैं कि भूख के कारण उनके जैसे प्रतापी योद्धा को भी घास की रोटी खानी पड़ी थी.

पद्म विभूषण, साहित्य आकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ जैसे सम्मानित पुरस्कारों से नवाजे गए हिंदी के इस यशस्वी और महनीय कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जयंती पर नमन.

# यह प्रस्तुति इंडिया टुडे मीडिया इंस्टीट्यूट में ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म से पीजी डिप्लोमा के छात्र और साहित्य आजतक में इंटर्न अक्षय दुबे की है.

 



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