समाजवाद के मास्टर – Master of Socialism


साल 2007. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, विधानसभा चुनाव सिर पर थे. एक रात तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने वादा किया कि अगले दिन पैतृक गांव सैफई में इंटरव्यू देंगे और चुनाव प्रचार में अपने साथ ले चलेंगे. कुछ देर बाद फिर फोन बजा, ”हेलिकॉप्टर में लोग ज्यादा होंगे. सैफई तक टीम का सिर्फ एक ही सदस्य जा सकेगा.” हमने तड़के कैमरा टीम सैफई के लिए कार से रवाना कर दी और बिना कैमरे की राजनीतिक चर्चा के लालच में उनके साथ हो लिए. लेकिन जब हेलिकॉप्टर उड़ने लगा तो खबर आई कि इटावा में एक सपा नेता के घर में किसी का निधन हुआ है. हेलिकॉप्टर इटावा पुलिस लाइन उतर गया. दिन की सभी रैलियां रद्द कर दी गईं. मुलायम सिंह छोटे कार्यकर्ता के घर पर पूरा दिन शोक में शामिल होने वाले थे. बोले, ”यहीं कर लो इंटरव्यू, एक घंटा है.” जब मैंने कहा हमारी टीम तो सैफई में है तो मुड़े और पायलट से कहा, ”तुरंत जाओ सैफई से इनकी टीम ले आओ.” सब हैरत में थे. हेलिकॉप्टर उड़ा, वापस आया. इंटरव्यू हुआ.

जमीनी नेता का एक और हवाई प्रसंग याद आ रहा है. हमारे एक कैमरा पर्सन साथी अजमल जामई जुलाई 2003 में विजय माल्या के हेलिकॉप्टर में हुबली से बगलकोट जा रहे थे. हवाई पट्टी के ऊपर सौ फुट से हेलिकॉप्टर बेकाबू हुआ और पेड़ से गिरते फल की तरह नीचे आ गया. माल्या और ऐक्टर संजय खान को हल्की चोटें आईं और कैमरा वाले दोस्त का हाथ फ्रैक्चर हुआ. लेकिन हादसे का सदमा इतना गहरा था कि वे कई साल हेलिकॉप्टर में नहीं बैठे. एक दिन मेरे साथ मुलायम सिंह की एक रैली के लिए हेलिकॉप्टर में चढ़े. मगर मनोवैज्ञानिक दबाव ऐसा कि उन्हें हवा में मितली आने लगी. उसके बाद दिनभर में छह बार मुलायम सिंह ने हेलिकॉप्टर में अपने पिटारे से इलेक्ट्रॉल पानी में घोल—घोलकर उनको पिलाया, फल दिए, जूस का इंतजाम करवाया. अजमल को वह सब याद है. ऐसे संस्मरण मेरे ही नहीं, अनेक पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, नेताओं और अफसरों के हैं. मुलायम सिंह ऐसे ही थे. अपने इर्द-गिर्द के लोगों का ख्याल रखते.

1960 के दशक में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नत्थू सिंह ने मैनपुरी के अखाड़े में मुलायम सिंह को अपने से भारी और ख्याति प्राप्त पहलवानों को पटकते देखा. और उनको लगा कि कद के छोटे मुलायम में सियासत की ऊंचाई छूने का सामर्थ्य है. पारखी रहे होंगे नत्थू सिंह क्योंकि उस समय कांग्रेस की 1947 की, गांधी, नेहरू, पटेल की हनक जबरदस्त तरीके से जिंदा थी. ऊंची जातियों का सत्ता के हर लेवल पर दबदबा था इसीलिए विपक्ष या पिछड़ी जाति के नए उभरते सेनापति उस वर्चस्व की दीवार को तोड़ने के लिए मनुहार या शिष्टाचार से काम नहीं चला सकते थे. उस समय हक़ छीन या लूटकर लिए जाते थे.  

यह वह समय था जब एक वर्ग स्कूल-पढ़ने, नौकरी पाने और भविष्य संवारने जाता था, मगर पिछड़े और दलित कांटेदार सीमाएं लांघने के लिए स्कूल पहुंचते थे. मुलायम सरीखों के लिए हर सिख्त रेत हुआ करती थी, वे यह ढूंढते थे कि जिस रेत पर नक्श नहीं बनते उस पर अपनी निशानी कैसे लिखें? इसलिए उनकी राजनीति में नफासत कम, मशक्कत और हिमाकत ज्यादा दिखती है.  

मुलायम पढ़ना चाहते थे और पिता उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे. गांव में अखाड़ा था, स्कूल नहीं था. नोट करें, कांग्रेस के संस्थापक ए.ओ. ह्यूम ने 1857 में बतौर जिला प्रभारी मुफ्त प्रारंभिक शिक्षा का अभियान सैफई से सिर्फ 20-22 किलोमीटर दूर इटावा में शुरू किया था. ग्राम प्रधान महेंद्र सिंह के घर रात की कक्षाओं में लालटेन में पढ़ाई होती थी. स्कूल के बाद मुलायम कॉलेज पहुंचे. दो जोड़ी सफेद कुर्ता-पजामा थे. बरसाती नाला पार करते ज्यादा मैले न हो जाएं इसलिए कपड़े पन्नी में लपेट ले जाते थे. गांव में पक्की सड़क भी नहीं थी. साइकिल को कंधे पर टांग बरगद की सबसे ऊंची टहनी पर चेन से बांध आते थे ताकि चोरी न हो जाए. कुछ बरस बाद उनके सियासी बरगद पर चढ़ने की शुरुआत हुई.

यह बात 1960 की है. जून के महीने में मैनपुरी के करहल इलाके के जैन इंटर कॉलेज में सरकार के खिलाफ बागी तेवर वाले कवि दामोदर स्वरूप ”विरोधी” आए. वे अपनी ”दिल्ली की गद्दी सावधान” कविता पढ़ने लगे. वहां तैनात दारोगा को सरकार के खिलाफ आवाज रोकने के आदेश थे. दारोगा मंच पर वर्दी के रुआब से भरा चढ़ा. और भीड़ से निकले 21 साल के मुलायम सिंह और उन्होंने दारोगा को मंच से बेदखल कर दिया.  

खबर स्थानीय सोशलिस्ट लीडर और विधायक नत्थू सिंह तक पहुंची. फिर उन्होंने मुलायम के बागी तेवर देख उनको कांग्रेस से लोहा लेते राम मनोहर लोहिया से मिलवाया. 60 यादवों के गांव के पहले ग्रेजुएट मुलायम के लिए नत्थू सिंह गुरु और लोहिया राजनीतिक दिशा बन गए. लेकिन नत्थू सिंह के बाद मुलायम को किसी ने चेला नहीं बनाया क्योंकि मुलायम खुद अपनी राजनीतिक जरूरत के अनुसार गुरु बनाते, गिराते रहे. लोहिया के बाद चरण सिंह, फिर हेमवती नंदन बहुगुणा, देवीलाल, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और हरकिशन सिंह सुरजीत को मुलायम ने गुरु माना, साथ चले. सबको एक न एक पटखनी जरूर दी और खुद जख्म भी झेले. 

मुलायम सिंह से मेरी पहली मुलाकात सितंबर, 1989 में हुई. तब बतौर नई नवेली पार्टी जनता दल के नेता, वे चौधरी देवीलाल की भेजी मैटाडोर से न्याय यात्रा निकाल रहे थे. गृह जनपद में मिला तो इंटरव्यू के बाद भोजन का न्योता मिला. उनके अपने गांव में पुराना मामूली सा घर, उनकी अम्मा के हाथ का बना खाना—साग, घी से लबरेज दाल, भरवां मिर्ची का अचार.

1989 का साल भारतीय राजनीति का चाल-चरित्र बदलने वाला साल था. राजीव गांधी शाहबानो प्रकरण, बाबरी मस्जिद में हिंदुओं के लिए पूजा की अनुमति जैसे तमाम करतबों के बाद भी सत्ता गंवा चुके थे. संघ के संगठन विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में राम मंदिर का आंदोलन जोरों पर पहुंच चुका था. भाजपा और वाम मोर्चे के सपोर्ट से जनता दल सत्ता की देहरी पर पहुंच चुका था.  

उधर यूपी में मुलायम, प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की मोहर के खिलाफ अपने गुरु चरण सिंह के बेटे अजित सिंह को पटखनी दे खुद मुख्यमंत्री बन चुके थे. राजा मांडा यानी वीपी उनसे नाराज थे. चूंकि जब वे खुद 1980-1981 में उत्तर प्रदेश के मुखिया थे, मुलायम ने उनके ऐंटी डकैती अभियान का जमकर विरोध किया था. डकैतों की फेहरिस्त में सवर्णों के खिलाफ बागी हुए पिछड़े काफी संख्या में थे. मुलायम ओबीसी या अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटों पर तब से नज़र गड़ाए थे. कांग्रेस दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम वोट से जीत के खुश थी और पिछड़े उसके रडार पर नहीं थे. 

कुछ ही महीने बीते और अगस्त 1990 आते-आते मंडल और कमंडल, दो मजबूत राजनीतिक धाराएं देश में आमने-सामने थीं. मुलायम मंडल कमिशन की सिफारिशों के लागू होने के फायदे जानते थे. भाजपा लालकृष्ण आडवाणी को राम मंदिर आंदोलन की कमान सौंप कमंडल की लौ तेज कर चुकी थी. उधर, यूपी में भाजपा कल्याण सिंह को आगे बढ़ा पिछड़ों और हिंदुत्व का मिलाजुला प्रयोग कर रही थी.  

फिर मुलायम के लिए भाजपा ने मौका तैयार किया. उन्होंने अक्तूबर के आखिर और नवंबर की शुरुआत में दो बार अयोध्या में बाबरी मस्जिद पर हमला बोल रहे कारसेवकों पर गोली चलवा दी. तख़ल्लुस मिला मुल्ला मुलायम. पिछड़े और मुस्लिम वोटर को जोड़ मुलायम ने समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का नया फॉर्मूला निकाला. लेकिन मंदिर मुद्दे ने मुलायम और मंडल मसीहा वी.पी. सिंह को 1991 के चुनाव में हरा दिया.  

मगर मुलायम ने राजनीति मोड़ दी थी. अब वे यूपी में राजनीति की एक धुरी बन चुके थे. जमीन भाजपा बनाम मुलायम की थी. और इसे और मजबूती देने के लिए मुलायम पहला दांव हारते चुनाव में भी चल चुके थे. राम मंदिर की लहर वाले बरस 1991 में देश में लोकसभा और यूपी में विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए. मुलायम ने अपने गृह जनपद इटावा की सुरक्षित सीट से बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशीराम को सपोर्ट किया. अपने तत्कालीन पॉलिटिकल बॉस चंद्रशेखर और समाजवादी जनता पार्टी की इच्छा के खिलाफ जाकर. इसी चुनाव में कांशीराम की रैली में एक नारा लगा था. पत्रकार से नेता बने खादिम अब्बास का गढ़ा हुआ—मिले मुलायम-कांशीराम, हवा हो गए जय श्री राम.

अगले बरस के आखिर में मुलायम ने चंद्रशेखर से रास्ता अलगकर अपने जीवन का सबसे बड़ा दांव खेला. अपनी पार्टी बनाने का. समाजवादी पार्टी. अगला साल 1993 यूपी के लिए एक बार फिर चुनावी साल था. और उससे कुछ महीने पहले लखनऊ के एक गेस्ट हाउस में उनके भाई और राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव कांशी राम से मिले. सीटों का बंटवारा हुआ और समाजवाद से बहुजन मिल गया. पूरे चुनाव में ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’ का नारा गूंजता रहा. इस एक दांव के चलते मंदिर मुद्दे पर सरपट दौड़ता भाजपा का इंजन पटरी से उतर गया. उसे फिर यूपी में अपने दम पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटने में 24 साल लगे. 

लखनऊ में मुलायम के विरोधी कहते थे: ”ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको उन्होंने ठगा नहीं.”  

बसपा के साथ चल मुलायम मुख्यमंत्री बने. पहली कैबिनेट बैठक में भाजपा का लाया नकल विरोधी कानून वापस लेने का फरमान निकाला. फितरतन 1995 आते-आते मुलायम बसपा के साथ सरकार चलाने से थक चुके थे. बसपा भी आगे बढ़ने की फिराक में सहयोगी कम और विरोधी ज्यादा थी. भाजपा मुलायम को गिराने के लिए बसपा को रिझा रही थी. 1 जून, 1995 को कांशीराम दिल्ली में अस्पताल में भर्ती हुए. कहते हैं कि वहां उन्होंने पार्टी महासचिव मायावती से पूछा ”मुख्यमंत्री बनोगी?” उस दिन लखनऊ में मुलायम मीटिंग में थे, तब उनके मुख्य सचिव और बाद के दौर में कांग्रेस सांसद रहे पी.एल. पुनिया कमरे में आए और मुख्यमंत्री को एक पर्ची दी.

मुलायम ने उसे पढ़कर वहां बैठे नेताओं से कहा, चुनाव की तैयारी करो. 2 जून को मायावती लखनऊ पहुंच मीराबाई रोड स्थित स्टेट गेस्ट हाउस के कमरा नंबर-1 में सपा का साथ छोड़ने की तैयारी में थीं. सपा के कार्यकर्ताओं ने उन पर हमला किया. गेस्ट हाउस कांड ने सपा-बसपा का 25 साल लंबा तलाक करवाया. मुलायम की सरकार को केंद्र ने बर्खास्त कर दिया. मायावती भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री और नेता बन गईं. इसके साथ ही यूपी में राजनीति सपा बनाम बसपा हो गई. कांग्रेस खत्म होती रही और भाजपा पर ग्रहण लगा रहा. सत्ता उसे मिली मगर मायावती की शरण में जाकर. मुलायम सिंह ने उत्तर भारत में विपक्ष को मुख्य धारा में ला खड़ा किया.  

1995 का मायावती से बदला मुलायम ने 2003 में बसपा विधायकों को तोड़ सरकार बनाकर लिया. राजनीतिक पैनापन बरकरार था. यादव-मुस्लिम साथ थे मगर मंडल का विस्तार करना था. जालौन में जन्मी दस्यु फूलन देवी को मिर्जापुर से चुनाव लड़वा दिया. फूलन मल्लाह थीं और पूर्वी यूपी में इस जाति का अंकगणित के लिहाज से दबदबा था. मायावती ने कुंडा के राजा भैया को निशाना बनाया तो मुलायम ने उनका साथ देकर ठाकुर वोट को अपनी तरफ किया. लेकिन उठापटक और दांव-पेच की राजनीति काठ की हांडी जैसी होती है, लंबी नहीं चलती और काठी जल जाती है.  

मुलायम ने गुरु चरण सिंह के बेटे अजित सिंह को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया. गुरु देवीलाल, बहुगुणा को मौका देख दरकिनार किया. बाद में समर्थन देने से मना कर सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोका. वाम दलों ने न्यूक्लियर डील पर मनमोहन से समर्थन खींचा तो उनको छोड़ कांग्रेस का साथ दिया. 2012 में ममता बनर्जी से मिल राष्ट्रपति के लिए मनमोहन सिंह का प्रस्ताव किया, फिर पलटी मारी और प्रणब मुखर्जी का नाम लिया.

यानी चोटें दीं, मगर चोट खाई भी. कांग्रेस और वी.पी. सिंह ने उन्हें 1996 में प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया. फिर यूपीए के दौर में कांग्रेस ने उनकी नकेल कसके रखने के लिए आय से अधिक संपत्ति का आरोप पूरे परिवार पर लगाया. वे मुख्यमंत्री तीन बार बने मगर कार्यकाल एक बार भी पूरा न हुआ. और राष्ट्रीय नेता बनने की मशकक्त भी चलती ही रही.  

1996 से सपा में अमर सिंह जड़ जमा रहे थे. मुलायम की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए उन्होंने बॉलीवुड और कारोबारी दुनिया के सितारे ला खड़े किए. लेकिन इस फेर में समाजवाद की धार कमजोर हुई. फिर इन्हीं अमर सिंह ने मंदिर आंदोलन के चेहरा रहे कल्याण सिंह का सपा से 2009 में गठजोड़ करवाया. इससे मुलायम की मुस्लिम हितैषी छवि को चोट लगी. और कांग्रेस को तात्कालिक फायदा पहुंचा.  

राजनीति अब बदल रही थी. और किसान की तरह मुलायम सिंह यूपी की राजनैतिक मिट्टी को अच्छे तरीके से सूंघ पा रहे थे. वे चप्पे-चप्पे से वाकिफ थे. एक उदाहरण तो मेरे सामने का था. 2004 के लोकसभा चुनाव की बात है. सीएम मुलायम ने एक दिन में 19 रैलियां कीं. शुरुआती दो के बाद तीसरी रैली के लिए हेलिकॉप्टर उड़ा तो बादलों के चलते पायलट को रैली स्थल की लोकेशन नहीं मिल रही थी. कुछ देर ऊहापोह की स्थिति रही, मगर मुलायम भन्ना गए. नीचे दो-चार मिनट देखा और हेलिकॉप्टर के फोन पर पायलट से बोले ”ये नहर दिख रही है, यहां से पूरब चलो, रेलवे लाइन आएगी फिर रेलवे स्टेशन. वहां से बाईं तरफ 2-3 किलोमीटर में रैली ग्राउंड होगा.” 18 मिनट उड़ाने के बाद पायलट ने कहा, ”ग्राउंड से लोकेशन स्मोक दिख रहा है, पहुंचने वाले हैं.” 

आजमगढ़ में 2005 में कोई घटना हुई. हम मुख्यमंत्री के दफ्तर में उनसे मिलने के लिए बैठे थे. खबर मिली तो मुलायम सिंह ने फोन उठाया और मुबारकपुर के थानेदार और सपा के ब्लॉक प्रमुख से बात कराने को कहा. हैरत की बात थी कि दोनों का नाम लेकर ताकीद की. पूछे जाने पर बोले ”सबके नाम याद हैं, नियुक्तियां मैंने की हैं.”  

जमीनी समझ का नतीजा था कि 2012 में मुलायम थोड़ा पीछे हटे और सांसद बेटे अखिलेश को आगे कर दिया. जब समाजवाद अखिलेश से मिला तो बदल गया. ब्लैकबेरी पर मैसेज आने लगे. सपा नेता आइपैड इस्तेमाल करते दिखे. फेसबुक पर एंट्री हुई. अखिलेश ने कुछ बाहुबली नेताओं को दरकिनार किया. एक दिन प्रचार के दौरान मुलायम रैली ग्राउंड हेलिकॉप्टर से पहुंचे, अखिलेश रथ से. जब मैंने इंटरव्यू के दौरान पूछा, अखिलेश मुख्यमंत्री बनेंगे तो बोले ”मैं नहीं, जनता तय करेगी. अगर बहुमत मिला तो अखिलेश को पद मिलेगा.”  

2012 में बहुमत भी मिला और सूबे को नया सीएम भी. अखिलेश यादव. लेकिन यह दांव मुलायम का था. वे इस एक काम से पार्टी नेताओं की कानून-व्यवस्था के खिलाफ बनी दबंगई वाली छवि बदल रहे थे. और नई पीढ़ी को जमने दे रहे थे.

लेकिन जल्द पहलवान मुलायम पर दबाव राजनीति से पलट पारिवारिक हुआ. अखिलेश के मुख्यमंत्री बनाने से नाखुश लोगों में भाई शिवपाल, पत्नी साधना गुप्ता, दूसरा बेटा प्रतीक और कई थे. एक सरकार में 4-5 मुख्यमंत्री थे. मुलायम सिंह भी सत्ता नियंत्रण से दूर न रह पाए. अखिलेश कमजोर होते गए, खटास बढ़ती गई. 2016 अक्तूबर में दरार ऐसी पड़ी कि मुलायम अपनी पार्टी और चुनाव निशान खो बैठे. 2017 में जिस सत्ता पर झगड़ा था वह हाथ से चली गई.  

मुलायम सिंह ने पार्टी में सबसे ज्यादा जगह परिवार को दी मगर परिवार टूट गया. तीन बार मुलायम राज और एक बार अखिलेश राज से गैर यादव पिछड़ों को लगा कि सत्ता यादवों की है, वह विश्वास टूट गया.  

दक्षिण में पिछड़ों की राजनीति जब प्रबल हुई तो उसमें हिंदू धर्म के पारंपरिक स्वरूप और पदानुक्रम का विरोध शामिल था. मगर उत्तर प्रदेश की सियासत जाति के आधार पर बंटी रही, लेकिन ”हिंदू विरोधी नहीं हुई.” 2014 में सपा से छिटके गैर यादव पिछड़े और अति पिछड़े और बसपा से बिगड़े गैर जाटव दलित नरेंद्र मोदी के आने पर हिंदू पहचान में रम गए.  

लेकिन राजनीति का पहलवान इन सब दौर में भी जमीन की हलचल पढ़ना नहीं भूला था. अप्रैल 2014 में एक मुलाकात में मुलायम सिंह ने मुझसे आवाज हल्की कर कहा था, ”अगर वोट का प्रतिशत ऊंचा रहा तो भाजपा 65-70 सीट ले सकती है.” और फिर अगले चुनाव से पहले लोकसभा के आखिरी सत्र में उनका भाषण तो सबको याद ही है, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी के जीतने की भविष्यवाणी कर दी थी.

2019 आते-आते मुलायम सिंह थके दिखे. स्वास्थ्य ठीक नहीं था. अखिलेश ने मायावती से गठबंधन किया. लेकिन मैनपुरी की एक संयुक्त रैली में ऐसा लगा जैसे मुलायम सिंह को किसी अनजान जगह ला खड़ा किया गया हो. मंच पर खड़े कुछ बेगाने थे. चुनाव ने सिद्ध किया, गठबंधन का गणित ठीक था, केमिस्ट्री नहीं.  

1968 से बतौर पहलवान मुलायम सिंह की हर जीत के पीछे—जोड़-घटा कर पैदा किए गए राजनीति के नए केमिकल फॉर्मूले ही थे. सैफई में अंतिम संस्कार हुआ तो मुलायम की यात्रा खत्म हुई. विद्वान नफा-नुक्सान तय करेंगे, लेकिन एक बात पक्की है: सैफई गांव का पहलवानी करने वाला लड़का मुलायम जिस मंसूबे से स्कूल गया था उससे कहीं ज्यादा करके गया.  

(राहुल श्रीवास्तव इंडिया टुडे टीवी के नेशनल अफेयर्स एडिटर हैं)



Source link

Spread the love